जियोसाइंन्टिस्ट्स सोसायटी आफ राजस्थान (जीएसआर) के अनुभवी भूविज्ञानियों और अभियांत्रिकी भूविज्ञानी (इंजीनियरिंग जियोलॉजिस्ट) श्री डी.एस. पोरवाल, एन.एस. खमेसरा, दिलीप भड़कतिया, बी.एस. यादव, शैलेंद्र दशोरा, सुनील वशिष्ठ, के.एल. जागेटिया, ए.के. मालू, वी.पी. शर्मा, राजेश शर्मा, पी.सी. समर, एम.डी. खुर्शीद आलम, वी पी शर्मा एवं राजेश शर्मा के साथ दिनांक 30.04.2026 को फतहसागर की रपट से सटी पहाड़ियों का “भूस्खलन खतरों” का आंकलन किया। अवलोकन में पाया गया कि रपट के पास की पहाड़ी पर चट्टानों में सड़क के समानांतर दरारें हैं, जिसके कारण शिलाओं का टूटकर या लुढ़ककर सड़क पर या फतहसागर झील में गिरने की संभावनाएं बहुत बढ़ जाती हैं। ऐसी स्थितियों में जन और संसाधनों की अवांछनीय क्षति/हानि या दुर्घटनाएं हों सकती हैं। ये चट्टानें भारत की सबसे पुरानी चट्टानों में से एक है, कालान्तर में जमाव उपरांत भूकंप और पहाड़ बनने की प्रक्रिया में इनमें अरावली पर्वतमाला के समानांतर दरारों का निर्माण हों गया। इन दरारों के कारण शिलाओं में कमजोरी आ गयी हैं, वर्णित स्थल पर दरारें सड़क के समानांतर होने से सड़क पर टूटकर गिरने की संभावनाएं कई गुना बढ़ गयी हैं। पूर्व में भी इस स्थल पर पत्थरों के टूटकर गिरने की घटनाएँ हो चुकी हैं। विगत दशक में वर्षा का परिमाण बढ़ने से दरारों के माध्यम से अधिक पानी चट्टानों में गया हैं जिससे इन शिलाओं के दरकने और फिसलने की संभावनाएं कई गुना बढ़ गई हैं। कई बार सुबह-शाम सैर करने वाले लोगों ने छोटे पत्थरों के गिरने की बात भी कही गई है। पूर्व में 2012 में जीएसआई (भारतीय भूविज्ञान सर्वेक्षण) द्वारा तत्कालीन जिलाधिकारी को इस पर एक रिपोर्ट भी दी गयी थी और आगाह किया था। जिम्मेदार जिला प्रशासन और संबंधित विभागों को वर्षा पूर्व इस संभावित दुर्घटनाओं से जनसाधारण को बचाने के युद्धस्तर पर उपाय करना आवश्यक हैं।







